La Nina पर टकराव: NOAA और IMD की अलग-अलग भविष्यवाणियों का क्या मतलब?

La Nina पर टकराव: NOAA और IMD की अलग-अलग भविष्यवाणियों का क्या मतलब?
9 अप्रैल 2026 0 टिप्पणि jignesha chavda

मौसम की दुनिया में इस वक्त एक अजीब सी कशमकश चल रही है। एक तरफ NOAA (नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन) का क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर दावा कर रहा है कि ला नीना (La Niña) पहले ही अपनी जगह बना चुका है, वहीं भारत का अपना भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और अन्य वैश्विक एजेंसियां इस बात से सहमत नहीं हैं। यह सिर्फ आंकड़ों की लड़ाई नहीं है, क्योंकि ला नीना का आना या न आना सीधे तौर पर तय करेगा कि आपकी सर्दियों में कितनी ठंड होगी, दक्षिण भारत में कितनी बारिश होगी और आने वाले सालों में दुनिया कितनी गर्म होगी।

तापमान का खेल: अमेरिकी एजेंसी क्यों है इतनी आश्वस्त?

दरअसल, अमेरिका की एजेंसी CPC का कहना है कि प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान उम्मीद से कहीं ज्यादा गिर गया है। जब पानी ठंडा होता है, तो यह ला नीना की पहली निशानी होती है। उनके मुताबिक, पूर्वी हवाएं (Easterlies) अब काफी मजबूत हो गई हैं और पैसिफिक डेटलाइन के पास बादलों की कमी देखी गई है, जिससे वहां बारिश कम हो रही है। CPC का अनुमान है कि यह स्थिति मार्च 2026 तक बनी रहेगी। (सोचिए, अगर यह सच है तो हम पहले ही एक नए मौसम चक्र में दाखिल हो चुके हैं)।

लेकिन यहां ट्विस्ट यह है कि IMD का मानना है कि अभी हम 'ENSO न्यूट्रल' स्थिति में हैं। यानी न तो एल नीनो का असर है और न ही ला नीना का। उनका कहना है कि ला नीना धीरे-धीरे विकसित होगा और दिसंबर 2025 के आसपास अपनी पूरी ताकत पकड़ेगा। दिलचस्प बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया की मौसम एजेंसी (BoM) और एशिया-पैसिफिक क्लाइमेट सेंटर (APCC) भी भारत की ही राय रख रहे हैं। यानी एक तरफ अमेरिका है और दूसरी तरफ बाकी दुनिया की तीन बड़ी एजेंसियां।

दक्षिण भारत पर असर और IOD का कनेक्शन

अब आप सोच रहे होंगे कि इस बहस से हमें क्या फर्क पड़ता है? सीधा फर्क पड़ता है तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और दक्षिणी कर्नाटक के लोगों पर। इस समय उत्तर-पूर्व मानसून सक्रिय है। IMD के मुताबिक, भारतीय महासागर में 'निगेटिव IOD' (Indian Ocean Dipole) की स्थिति बनी हुई है। जब यह निगेटिव IOD और धीरे-धीरे विकसित होता ला नीना एक साथ मिलते हैं, तो दक्षिण भारत में भारी बारिश की संभावना बढ़ जाती है।

यही वजह है कि नवंबर और दिसंबर के दौरान दक्षिणी प्रायद्वीप में बारिश का स्तर काफी ऊपर जा सकता है। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि MJO (Madden-Julian Oscillation) का फेज 6 से फेज 7 में जाना अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में हलचल बढ़ाएगा, जो बारिश के पैटर्न को और प्रभावित करेगा।

इतिहास और बदलती जलवायु का दबाव

अगर हम इतिहास पलटकर देखें, तो 1950 के दशक के बाद से ऐसा सिर्फ छह बार हुआ है जब ला नीना दो साल से ज्यादा समय तक टिका रहा हो। लेकिन इस बार मामला थोड़ा पेचीदा है। जनवरी 2025 में ला नीना के ठंडे प्रभाव के बावजूद, कोपरनिकस (यूरोपीय जलवायु सेवा) ने बताया कि यह अब तक की सबसे गर्म जनवरी थी। वैश्विक तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.75 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म रहा।

इसका मतलब साफ है: ला नीना भले ही समुद्र को ठंडा कर दे, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग इतनी ताकतवर हो चुकी है कि वह ला नीना के 'कूलिंग इफेक्ट' को आसानी से दबा रही है। हमें यह भी याद रखना होगा कि ला नीना जहां भारत में बारिश ला सकता है, वहीं दक्षिण अमेरिकी देशों जैसे पेरू और इक्वाडोर में भीषण सूखा पैदा कर देता है।

2027: क्या हम सबसे गर्म साल की ओर बढ़ रहे हैं?

सबसे डराने वाली चेतावनी फरवरी 2026 को लेकर आई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे ही ला नीना खत्म होगा, एल नीनो (El Niño) की वापसी होगी। यह बदलाव बहुत खतरनाक हो सकता है क्योंकि ला नीना की ठंडक के बाद अचानक आने वाला एल नीनो तापमान को रॉकेट की तरह ऊपर ले जा सकता है। कुछ विशेषज्ञों ने तो यहां तक कह दिया है कि साल 2027 इतिहास का सबसे गर्म वर्ष साबित होगा।

कुल मिलाकर, चाहे NOAA सही हो या IMD, एक बात तय है कि हमारा मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा। पूर्वानुमानों में यह अंतर दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन अब इतना जटिल हो चुका है कि दुनिया की सबसे बड़ी एजेंसियां भी एक नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

ला नीना और एल नीनो में बुनियादी अंतर क्या है?

ला नीना तब होता है जब प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से कम (ठंडा) हो जाता है, जिससे अक्सर भारत में अच्छी बारिश होती है। इसके विपरीत, एल नीनो में तापमान बढ़ जाता है, जिससे भारत में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है और वैश्विक तापमान बढ़ता है।

NOAA और IMD की राय अलग होने से क्या असर पड़ेगा?

राय अलग होने से अल्पकालिक पूर्वानुमानों (short-term forecasts) में अनिश्चितता बढ़ जाती है। हालांकि, दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ला नीना का प्रभाव दिखेगा, बस उसके 'शुरुआत' के समय को लेकर मतभेद है, जिससे खेती और आपदा प्रबंधन की तैयारी पर असर पड़ सकता है।

दक्षिण भारत में बारिश क्यों बढ़ सकती है?

दक्षिण भारत में बारिश बढ़ने का मुख्य कारण 'निगेटिव IOD' और 'ला नीना' का एक साथ होना है। ये दोनों स्थितियां मिलकर नमी वाली हवाओं को भारतीय प्रायद्वीप की ओर धकेलती हैं, जिससे तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में भारी वर्षा होती है।

क्या 2027 वाकई सबसे गर्म साल होगा?

वैज्ञानिकों को डर है कि ला नीना के खत्म होते ही एल नीनो का प्रभाव शुरू होगा। चूंकि पृथ्वी का औसत तापमान पहले ही बढ़ चुका है, इसलिए एल नीनो का अतिरिक्त ताप 2027 को रिकॉर्ड तोड़ गर्मी वाला साल बना सकता है।